खेल

वैभव सूर्यवंशी के सामने नई मुश्किल, टीम इंडिया और घरेलू क्रिकेट के बीच उलझा मामला

नई दिल्ली
नंबर-3 पर बल्लेबाजी करते हुए वैभव 8 गेंदों में सिर्फ 4 रन बना सके. लेकिन ओपनिंग में लौटे तो 19 गेंदों पर 45 रन ठोककर अपनी असली ताकत दिखा दी. इसके बावजूद उन्हें अगला मैच खेलने का मौका नहीं मिला. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की रफ्तार, तेज गेंदबाजों की चुनौती और नई बल्लेबाजी भूमिका से उनका सामना जरूर हुआ, लेकिन क्या इस अनुभव ने उनके खेल में कुछ नया जोड़ा?

वैभव सूर्यवंशी के लिए न्यूजीलैंड का दौरा सिर्फ एक विदेशी सीरीज नहीं था. 15 साल की उम्र में सीनियर टीम के साथ अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है. यहां उन्हें दुनिया के तेज गेंदबाजों का सामना करने, अलग-अलग परिस्थितियों में बल्लेबाजी करने और टीम के भीतर जगह बनाने की चुनौती समझने का मौका मिला. लेकिन इस दौरे की कहानी में एक बड़ा सवाल भी छिपा है. वैभव टीम के साथ तो रहे, मगर ज्यादातर समय बेंच पर बीता. पांच मैचों की सीरीज में सिर्फ दो बार मैदान पर उतर पाए.

पहले उन्हें उनकी पहचान से अलग नंबर-3 पर बल्लेबाजी के लिए भेजा गया. वहां बल्ला नहीं चला. फिर ओपनिंग में लौटे तो अपने अंदाज में धमाका कर दिया. लेकिन एक अच्छी पारी के बाद भी उन्हें लगातार मौके नहीं मिले. ऐसे में न्यूजीलैंड दौरे से वैभव को अनुभव तो मिला, लेकिन मैच खेलने और अपनी गलतियों को सुधारने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया. यही इस दौरे की सबसे बड़ी कहानी है.

ओपनिंग छुड़ाई, नंबर-3 पर फंस गए वैभव!
वैभव की सबसे बड़ी ताकत पारी की शुरुआत में गेंदबाजों पर हमला करना है. पावरप्ले में फील्डिंग की पाबंदियों का फायदा उठाकर बड़े शॉट खेलना उनकी पहचान बन चुकी है. लेकिन न्यूजीलैंड के खिलाफ दूसरे टी20 में उन्हें पहली बार नंबर-3 पर बल्लेबाजी के लिए भेजा गया. यह उनके लिए नई भूमिका थी.

इस पोजिशन पर उन्हें पारी की शुरुआत से ही आक्रामक होने की बजाय हालात को समझने और विकेट गिरने के बाद पारी को आगे बढ़ाने की चुनौती मिली. न्यूजीलैंड के तेज गेंदबाजों ने भी उनकी परीक्षा ली. 143.5 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आई बाउंसर ने उन्हें मुश्किल में डाला. वैभव को एक जीवनदान भी मिला, लेकिन वह इसका फायदा नहीं उठा सके और 8 गेंदों पर 4 रन बनाकर आउट हो गए.

इस पारी से उन्हें एक अहम अनुभव मिला. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में सिर्फ अपनी ताकत के भरोसे काम नहीं चलता. बल्लेबाजी की पोजिशन बदलने पर शॉट चयन, गेंद की लाइन-लेंथ को पढ़ने और पारी की जरूरत के मुताबिक खेलने का तरीका भी बदलना पड़ता है. वैभव के लिए यह सीख आगे काम आ सकती है. हालांकि, एक पारी के आधार पर नई भूमिका में उनकी क्षमता का आकलन करना जल्दबाजी होगी.

ओपनिंग में लौटे, कीवी गेंदबाजों को कूटा
अगले मौके पर वैभव को फिर ओपनिंग में उतारा गया. इस बार उन्होंने अपनी पहचान के मुताबिक बल्लेबाजी की. न्यूजीलैंड के गेंदबाजों पर शुरुआत से ही हमला बोला और महज 19 गेंदों पर 45 रन ठोक दिए. उनकी पारी में पांच छक्के और तीन चौके शामिल रहे.

यह पारी बताती है कि वैभव को अपनी स्वाभाविक भूमिका में उतरने पर किस तरह खुलकर खेलने का मौका मिलता है. वह गेंदबाजों को दबाव में डाल सकते हैं और कुछ ही ओवरों में मैच का रुख बदलने की क्षमता रखते हैं. इसी मुकाबले में अभिषेक शर्मा ने 38 गेंदों पर 113 रन की तूफानी पारी खेली और भारत ने 199 रन का लक्ष्य 13.2 ओवरों में हासिल कर लिया.

वैभव की 45 रनों की पारी भले ही अभिषेक के शतक के सामने चर्चा में कम रही, लेकिन उनके लिहाज से यह बेहद अहम थी. नंबर-3 पर नाकामी के बाद उन्होंने ओपनिंग में लौटकर अपनी क्षमता दिखाई. उन्हें यह भरोसा मिला होगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वह अपनी आक्रामक बल्लेबाजी से असर डाल सकते हैं.

बल्ला चला, फिर भी प्लेइंग-11 से पत्ता कटा
वैभव के लिए सबसे बड़ा सवाल यही रहा कि शानदार पारी खेलने के बाद भी उन्हें आगे लगातार मौके क्यों नहीं मिले. ईशान किशन की वापसी के साथ टीम संयोजन बदला और वैभव को प्लेइंग-11 से बाहर बैठना पड़ा. इसके बाद सीरीज में उन्हें अपनी बल्लेबाजी को आगे बढ़ाने का मौका नहीं मिला.

भारतीय टीम के शीर्ष क्रम में पहले से ही कड़ी प्रतिस्पर्धा है. अभिषेक शर्मा, संजू सैमसन और ईशान किशन जैसे विकल्प मौजूद हैं. ऐसे में टीम के लिए हर खिलाड़ी को जगह देना आसान नहीं है. लेकिन वैभव के मामले में एक सवाल जरूर बनता है कि उन्हें किस भूमिका के लिए तैयार किया जा रहा है? अगर उनकी ताकत ओपनिंग है तो क्या उन्हें इसी पोजिशन पर लगातार मौके मिलेंगे? और अगर टीम उन्हें मिडिल ऑर्डर के विकल्प के तौर पर देख रही है तो उस भूमिका में ढलने के लिए कितने मौके दिए जाएंगे?

किसी युवा खिलाड़ी को अलग-अलग पोजिशन पर आजमाना गलत नहीं है, लेकिन उसकी भूमिका को लेकर स्पष्टता भी जरूरी है. वैभव को न्यूजीलैंड दौरे पर दोनों तरह का अनुभव मिला, मगर किसी एक भूमिका में निरंतरता नहीं मिल सकी.

मैदान से ज्यादा बेंच पर बैठे वैभव!
इस दौरे का एक दूसरा पहलू भी है. पांच मैचों की सीरीज में वैभव को सिर्फ दो मुकाबले खेलने का मौका मिला. बाकी समय उन्होंने ड्रेसिंग रूम और बेंच से टीम का खेल देखा. अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों के साथ रहना, उनकी तैयारी और रणनीति को समझना निश्चित रूप से सीखने का हिस्सा है. लेकिन मैच में उतरकर दबाव झेलना और अपनी गलतियों को सुधारना भी उतना ही जरूरी है.

इसी दौरान बिहार की टीम रणजी ट्रॉफी के मैच भी खेल रही थी. 11 अक्टूबर से 2 नवंबर के बीच बिहार ने उत्तर प्रदेश, बड़ौदा, मध्य प्रदेश और गोवा के खिलाफ मुकाबले खेले. अगर वैभव उस समय भारत में होते और बिहार के लिए उपलब्ध रहते, तो उन्हें भी खेलने का मौका मिल सकता था. रणजी में खेलने से उन्हें लाल गेंद से बल्लेबाजी और लंबी पारी खेलने का अनुभव मिल सकता था, जो उनके खेल के लिए फायदेमंद रहता.

अनुभव मिला, मौके नहीं… वैभव ने क्या पाया?
इस दौरे पर वैभव ने तीन नई चीजें सीखीं. उन्हें अंतरराष्ट्रीय तेज गेंदबाजों की रफ्तार और उछाल का सामना करने का अनुभव मिला. ओपनिंग की बजाय नंबर-3 पर बल्लेबाजी करने का मौका मिला. साथ ही उन्हें यह भी समझने का मौका मिला कि सीनियर टीम में जगह बनाने के लिए कितनी प्रतिस्पर्धा है और टीम की जरूरत के हिसाब से खिलाड़ियों की भूमिका कैसे बदलती है.

उनकी दो पारियों का कुल स्कोर 49 रन रहा. पहली पारी में वह नंबर-3 पर 8 गेंदों में 4 रन बना सके, जबकि दूसरी में ओपनिंग करते हुए 19 गेंदों पर 45 रन बनाए. इन आंकड़ों से एक बात साफ है कि वैभव को अभी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में खुद को लगातार साबित करने के लिए और मौके चाहिए. एक असफल पारी के बाद वापसी करना और एक अच्छी पारी के बाद उसी आत्मविश्वास को आगे ले जाना किसी भी युवा बल्लेबाज के लिए जरूरी है.

15 साल की उम्र में वैभव के पास सीखने और आगे बढ़ने के लिए काफी समय है. उन्हें जल्दबाजी में किसी नतीजे पर पहुंचाने की जरूरत नहीं. लेकिन टीम प्रबंधन को भी यह तय करना होगा कि उनकी आक्रामक बल्लेबाजी का सबसे अच्छा इस्तेमाल कैसे किया जाए. सिर्फ टीम के साथ रखने से उनका विकास नहीं होगा. उन्हें मैदान पर उतरने, अपनी भूमिका समझने और लगातार खेलने के अवसर भी चाहिए.

गंभीर की 'गुड डिसीजन' वाली सोच में वैभव फिट होंगे?
22 से 27 दिसंबर तक श्रीलंकाई टीम भारत दौरे पर तीन मैचों की टी20 सीरीज खेलेगी. अब देखना होगा कि इस सीरीज में वैभव सूर्यवंशी को मौका मिलता है या नहीं. हेड कोच गौतम गंभीर पहले ही कह चुके हैं, ''मुझे पॉपुलर डिसीजन नहीं, गुड डिसीजन लेने हैं.' यानी वैभव को टीम में जगह सिर्फ नाम और लोकप्रियता के दम पर नहीं मिलेगी. लेकिन सवाल यह भी है कि क्या उनकी प्रतिभा और आक्रामक बल्लेबाजी टीम के लिए फायदेमंद नहीं होगी? गंभीर अपनी इसी सोच पर कायम रहते हैं या वैभव को एक और मौका देते हैं, इसका जवाब दिसंबर में मिलेगा. इतना जरूर है कि वैभव जैसे प्रतिभाशाली बल्लेबाज को टीम में शामिल करने से भारतीय क्रिकेट को नुकसान नहीं, फायदा ही होगा.

न्यूजीलैंड दौरे पर वैभव ने अपनी प्रतिभा की झलक दिखाई, लेकिन उन्हें अपनी क्षमता को लगातार साबित करने का मंच नहीं मिला. वह टीम इंडिया के साथ रहे, पर नियमित खिलाड़ी नहीं बन पाए. ओपनिंग में चमके, लेकिन फिर बाहर हो गए. यही वजह है कि न्यूजीलैंड दौरे से उन्हें अनुभव तो मिला, मगर वह जवाब नहीं मिला जिसकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी- टीम इंडिया में उनकी असली भूमिका क्या है और उस भूमिका में उन्हें लगातार मौके कब मिलेंगे?

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