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रामकथा की अमूल्य धरोहर को एक छत के नीचे लाने की पहल, दुर्लभ पांडुलिपियों पर काम शुरू

 अयोध्या
 सनातन संस्कृति की अमर गाथा रामकथा अब केवल भारत की भूमि तक सीमित नहीं रही। वह सदियों पहले ही देश की सीमाओं को लांघकर संसार के कोने-कोने में पहुंच चुकी थी और विभिन्न भाषाओं, लिपियों और संस्कृतियों में अपनी अमिट छाप छोड़ चुकी थी। अब उन्हीं बिखरी हुई अमूल्य धरोहरों को एक छत के नीचे लाने का ऐतिहासिक संकल्प लिया गया है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने राम मंदिर के दूसरे तल पर स्थित राम नाम मंदिर में देश और विदेश में उपलब्ध रामायण की दुर्लभ पांडुलिपियों को संरक्षित कराने तथा उनके डिजिटल संस्करण से आम श्रद्धालुओं को परिचित कराने की एक ऐतिहासिक योजना पर कार्य आरंभ कर दिया है। इस योजना के अंतर्गत फिलहाल तीन ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज प्रारंभ हुई है जो न केवल धार्मिक बल्कि भाषाई, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनमें तमिलनाडु के तंजावुर में संरक्षित एक ऐसी विलक्षण संस्कृत पांडुलिपि है जिसके श्लोकों को एक दिशा में पढ़ने पर रामकथा और विपरीत दिशा में पढ़ने पर कृष्णकथा प्रकट होती है। इसके अलावा मुगलकाल में फारसी भाषा में रची गई रामायण की पांडुलिपि और विलुप्त होने के कगार पर खड़ी ताई जनजाति के पास संरक्षित ताई भाषा की रामायण की मूल प्रति को भी प्राप्त करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह पहल इस बात का प्रमाण है कि राम केवल एक आस्था नहीं, वे एक वैश्विक सांस्कृतिक चेतना हैं।

इस महत्वाकांक्षी योजना का कार्यान्वयन
इस महत्वाकांक्षी योजना को मूर्त रूप देने के लिए अवकाश प्राप्त आईएएस अधिकारी एवं प्रधानमंत्री कार्यालय के सलाहकार नृपेन्द्र मिश्र की अध्यक्षता में पांडुलिपि विशेषज्ञों की एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन किया गया है। इस कमेटी की प्रथम बैठक में विशेषज्ञों की सम्मति के अनुरूप दो अलग-अलग श्रेणियों की पांडुलिपियों को प्राप्त करने का निर्णय लिया गया है। पहली श्रेणी में अत्यंत दुर्लभ पांडुलिपियां सम्मिलित होंगी जबकि दूसरी श्रेणी में शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण रामायण की अन्य पांडुलिपियां रखी जाएंगी। इस दिशा में अभी से दुर्लभ श्रेणी की तीन अलग-अलग पांडुलिपियों की खोज प्रारंभ हो चुकी है।

तेलुगू भाषा की चित्र बंध रामायण
काव्य और चित्रकला का अनूठा संगम है तेलुगू भाषा की चित्र बंध रामायण। तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित विश्वप्रसिद्ध सरस्वती महल पुस्तकालय में चित्र बंध रामायण की पांडुलिपि के चतुर्थ सर्ग तक के ही अंश उपलब्ध हैं। पांचवें सर्ग के उपरांत की शेष रचना अभी तक अप्राप्त है जो इस कृति की खोज को और भी रोमांचक और आवश्यक बनाती है। इसके रचनाकार के संदर्भ में निश्चित जानकारी का अभाव है परंतु विद्वानों की मान्यता है कि 16वीं शताब्दी में कवि यज्ञराज ने ताड़ पत्र पर यह अनुपम रचना की थी। यह कृति काव्य और चित्रकला का ऐसा दुर्लभ संगम है जो भारतीय साहित्य की अद्वितीय परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।

चित्र बंध रामायण का विलक्षण तकनीकी पक्ष
यह कृति मुख्यतः संस्कृत भाषा में रचित है जिसमें रामायण की कथा को विभिन्न चित्र बंधों के माध्यम से अत्यंत कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें कवि ने शब्दों को इस प्रकार व्यवस्थित किया है कि वे कमल, रथ, धनुष अथवा तलवार जैसी सुंदर आकृतियां बनाते हैं। काव्य और दृश्य कला के इस संयोजन को देखकर आज भी विद्वान और कलाप्रेमी विस्मित हो जाते हैं।

इस दुर्लभ चित्र बंध रामायण का सर्वाधिक विलक्षण तकनीकी पक्ष इसका अनुलोम-विलोम काव्य है। इस पांडुलिपि के 30 श्लोक इस प्रकार अद्भुत रूप से रचे गए हैं कि उन्हें बाएं से दाएं अर्थात अनुलोम पढ़ने पर रामायण की कथा प्रकट होती है और दाएं से बाएं अर्थात विलोम पढ़ने पर श्रीकृष्ण की कथा उभरती है। इस प्रकार इसमें कुल 60 श्लोक हैं जिनमें 30 मुख्य और 30 उनके प्रतिलोम हैं। उदाहरण के रूप में एक श्लोक श्रीराम के अयोध्या लौटने की भव्य कथा सुनाता है तो उसी श्लोक को उल्टा पढ़ने पर वह श्रीकृष्ण की मनोहर स्तुति बन जाता है। यह प्राचीन पांडुलिपियों की उस गौरवशाली विधा का हिस्सा है जिसे तंजावुर के मराठा राजा सेरफोजी द्वितीय ने अपने शासनकाल 1798 से 1832 के मध्य संरक्षित कराया था। ताड़ के पत्तों पर लिखित इस पांडुलिपि का संग्रह भाषा और साहित्य के क्षेत्र में अपनी तरह का एकमात्र उदाहरण है।

फारसी में रामायण की रचना
15वीं शताब्दी में अब्दुल कादिर बदायूंनी ने भी फारसी में की रामायण की रचना। राम मंदिर के दूसरे तल पर दुर्लभतम पांडुलिपियों को स्थान देने के निर्णय के परिप्रेक्ष्य में एक ऐसी अत्यंत महत्वपूर्ण पांडुलिपि की सूचना प्राप्त हुई है जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक अनूठा एवं बेजोड़ ग्रंथ माना जा सकता है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से अलंकृत आचार्य सत्यव्रत शास्त्री ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को यह बहुमूल्य जानकारी प्रदान की कि यदि भाषाई प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर देखा जाए तो इस पांडुलिपि को निस्संदेह दुर्लभतम श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

आचार्य शास्त्री के अनुसार इस ऐतिहासिक पांडुलिपि की रचना मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में सन 1584 से 1588 ईस्वी के मध्य हुई थी और इसके रचनाकार अब्दुल कादिर बदायूंनी थे। यह तथ्य अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि रामकथा की व्यापकता और प्रभाव किसी एक भाषा, धर्म अथवा समुदाय की सीमाओं में कभी नहीं बंधा। यह भी बताया गया कि तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बदायूंनी ने इस अमूल्य पांडुलिपि के संरक्षण के लिए इसे जयपुर नरेश को सुपुर्द कर दिया था। जयपुर नरेश इस पांडुलिपि के प्रति इतने संवेदनशील और समर्पित थे कि उन्होंने घोषणा की थी कि यदि विकट परिस्थितियों में उन्हें राजमहल छोड़कर जाना पड़ा तो वे इस पांडुलिपि को अपने साथ लेकर ही जाएंगे।

आचार्य शास्त्री ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पूर्व में सरकारी स्तर पर इस पांडुलिपि के संरक्षण के लिए प्रयास किए थे परंतु प्रशासनिक उदासीनता के कारण वह प्रयास सफल नहीं हो सका। इसीलिए उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से इस दिशा में पहल करने का आग्रह किया है जो एक राष्ट्रीय दायित्व भी है।

ताई भाषा की रामायण की पांडुलिपि
ताई भाषा में रचित रामायण की पांडुलिपि का पुनर्लेखन कराएगा ट्रस्ट। असम से म्यांमार होते हुए चीन के सीमांत क्षेत्रों में निवास करने वाली ताई जनजाति आज विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है। इस जनजाति के अवशेष स्वरूप लगभग दो हजार की जनसंख्या वाला एक समूह फिलहाल म्यांमार में निवास करता है। इस समूह के पास ताई भाषा में रचित रामायण की मूल प्रति अभी भी सुरक्षित है जो इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यह वाल्मीकि रामायण की मूल कथा पर आधारित है और साथ ही इसमें ताई समुदाय की समृद्ध संस्कृति भी जीवंत रूप में संरक्षित है।

इस अनमोल धरोहर के संरक्षकों ने इस विशिष्ट ग्रंथ को अनंत काल तक सुरक्षित रखने की भावना से प्रेरित होकर इसे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को सौंपने पर सहमति व्यक्त की है। साथ ही उनकी हार्दिक इच्छा है कि पांडुलिपि के सौंपने से पूर्व उसका पुनर्लेखन किया जाए ताकि यह सांस्कृतिक स्मृति उनके समुदाय के पास भी सदा के लिए सुरक्षित रहे। ताई समुदाय की इस गरिमापूर्ण भावना का सम्मान करते हुए ट्रस्ट ने पुनर्लेखन पर पूर्ण सहमति प्रदान कर दी है।

पुनर्लेखन और संरक्षण प्रक्रिया
पांडुलिपि संरक्षण कमेटी के संयोजक एवं अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के निदेशक डा. संजीब कुमार सिंह ने बताया कि पुनर्लेखन के लिए ताई समुदाय के ही जानकार विशेषज्ञों की खोज की जाएगी ताकि भाषाई और सांस्कृतिक प्रामाणिकता बनी रहे। यह कार्य समयसाध्य अवश्य है किंतु ट्रस्ट इसके लिए पूर्णतः तत्पर और प्रतिबद्ध है। इसके साथ ही कमेटी के विशेषज्ञों ने यह सुझाव भी दिया है कि आधुनिक तकनीक का उपयोग करते हुए इस पांडुलिपि की हूबहू प्रतिकृति भी तैयार की जाए। ट्रस्ट इस प्रक्रिया के लिए भी सहमत है और इस प्रकार दोनों विधियां एक साथ अपनाई जाएंगी।

डा. सिंह ने यह भी बताया कि इस समुदाय से संवाद स्थापित करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है क्योंकि वे अपनी जनजातीय भाषा के अलावा केवल टूटी-फूटी हिंदी ही जानते हैं और अंग्रेजी भाषा से वे परिचित नहीं हैं। इस भाषाई बाधा को दूर करने के लिए तेजपुर असम के प्रतिष्ठित पांडुलिपि विशेषज्ञ प्रो. रवीन्द्र दत्ता को दुभाषिए के रूप में नियुक्त किया गया है।

आदिवासी जनजाति की पांडुलिपि का महत्व
आदिवासी जनजाति के इस ग्रंथ का है राष्ट्रीय महत्व। पांडुलिपि मिशन एवं भारत दर्शन मिशन के निदेशक डा.अर्णव का स्पष्ट मत है कि जनजातीय समुदाय की संस्कृति को अपने भीतर समेटे यह ग्रंथ अत्यंत दुर्लभ श्रेणी में आता है। इसकी लिपि प्राचीन ब्राह्मी लिपि से साम्यता रखती है जो इसे भाषाशास्त्रीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है। उन्होंने बल देकर कहा कि आदिवासी जनजाति के इस ग्रंथ का राष्ट्रीय और सांस्कृतिक महत्व असाधारण है। यह भी बताया गया कि वर्तमान समय में मूल ग्रंथ की हूबहू प्रतिकृति तैयार करने के लिए अत्यंत उन्नत और सटीक तकनीकें विकसित हो चुकी हैं अतः इस कार्य में कोई तकनीकी बाधा नहीं है।

कमेटी के चेयरमैन नृपेन्द्र मिश्र ने भी इस संदर्भ में हरी झंडी देते हुए स्पष्ट किया है कि ग्रंथ के पुनर्लेखन के साथ-साथ उसकी प्रतिकृति भी तैयार की जाए। साथ ही संबंधित समुदाय से पुनः विस्तृत बातचीत कर यह निर्धारित किया जाए कि वे मूल ग्रंथ सौंपने के लिए सहमत हैं अथवा केवल प्रतिकृति देने के लिए तैयार हैं। जो भी उपलब्ध हो सके उसे संरक्षण के लिए प्राप्त किया जाए।

नेपाल में लिखी रामायण की पांडुलिपि
नेपाल में 11वीं शताब्दी में लिखी गई रामायण की पांडुलिपि भी उपलब्ध। 11वीं शताब्दी में नेपाली भाषा में रचित नेपाली रामायण भी अपने आप में एक अत्यंत विशिष्ट और मूल्यवान कृति है। इस महत्वपूर्ण पांडुलिपि की जानकारी पांडुलिपि मिशन एवं भारत दर्शन मिशन के निदेशक डा. अर्णव ने समिति को प्रदान की और इसे भी संग्रह में सम्मिलित करने की दृढ़ता से वकालत की है।

अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय के निदेशक डा. संजीब कुमार सिंह का कहना है कि 11वीं शताब्दी की नेपाली रामायण की जानकारी मिलना कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि रामकथा का प्रसार तो सदियों पूर्व से ही समस्त एशिया में हो चुका था। थाईलैंड और कंबोडिया में आठवीं शताब्दी की रामायण पांडुलिपियां उपलब्ध हैं। कंब रामायण की रचना का कालखंड छठवीं से 12वीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि ब्रिटिशकालीन तिथि निर्धारण पद्धति के अनुसार श्रीमद वाल्मीकि रामायण का कालखंड एक हजार ईसा पूर्व माना गया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उस समय कागज का प्रचलन नहीं था और जो भी लेखन होता था वह भोज पत्र या ताड़ पत्र पर किया जाता था।

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